LAW'S VERDICT

आधार और वोटर आईडी जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं: हाईकोर्ट

इंदौर हाईकोर्ट का अहम फैसला, जन्मतिथि विवादों में अहम दस्तावेजों पर स्पष्ट टिप्पणी

इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड किसी भी व्यक्ति की जन्मतिथि (Date of Birth) का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माने जा सकते। जस्टिस जेके पिल्लई की बेंच ने कहा है कि इन दस्तावेजों के आधार पर जन्मतिथि का निर्धारण नहीं किया जा सकता, जब तक अन्य वैधानिक और प्राथमिक प्रमाण उपलब्ध न हों।

क्या है पूरा मामला

धार जिले में रहने वाली याचिकाकर्ता प्रमिला ने यह याचिका दायर कर 01/09/2020 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके द्वारा  हीराली बाई की अपील स्वीकार कर ली गई थी। इस आदेश के परिणामस्वरूप 21/11/2020 को प्रमिला को पद से हटा दिया गया और हीराली बाई को पुनः “आंगनवाड़ी सहायिका” के रूप में बहाल कर दिया गया।

आधार कार्ड–वोटर आईडी पर निर्भरता पर सवाल

हाईकोर्ट ने माना कि अपीलीय प्राधिकारी ने केवल आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र के आधार पर हीराली बाई के दावे को स्वीकार कर लिया, जबकि विभागीय सेवा अभिलेखों की अनदेखी की गई। न्यायालय ने इसे यांत्रिक और मनमाना दृष्टिकोण करार देते हुए अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग बताया।

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रमिला की सेवा समाप्ति से पूर्व उसे न तो कोई स्वतंत्र नोटिस दिया गया, न कोई जांच की गई और न ही कोई कारण दर्ज किया गया। ऐसी सेवा समाप्ति प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और विभागीय दिशा-निर्देशों के विपरीत है।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

जस्टिस जेके पिल्लई ने अपने फैसले में कहा कि आधार और वोटर आईडी स्व-घोषणा (Self Declaration) पर आधारित होते हैं। ये दस्तावेज जन्मतिथि के प्राथमिक या निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। इसके लिए सेवा रिकॉर्ड, स्कूल प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजों को ही प्राथमिकता दी जाएगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय बाद जन्मतिथि में बदलाव की मांग ‘Delay और Laches’ के सिद्धांत के तहत स्वीकार्य नहीं है।
याचिका खारिज, निचली अदालत का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार न करते हुए याचिका को खारिज कर दिया और संबंधित प्राधिकरण के आदेश को सही ठहराया।

हाईकोर्ट के निर्देश

न्यायालय ने 01/09/2020 और 21/11/2020 के दोनों आदेश निरस्त करके याचिकाकर्ता प्रमिला को आंगनवाड़ी केंद्र जमली (अंबापुरा) में आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर पुनः बहाल करने का आदेश दिया। सेवा की निरंतरता, काल्पनिक वरिष्ठता एवं सभी अनुषांगिक/आर्थिक लाभ देने के निर्देश दिए।

हीराली बाई से वेतन वसूली के आदेश

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि हीराली बाई को 05/03/2017 के बाद दिए गए वेतन एवं अन्य लाभ, जिनकी वे कानूनी रूप से हकदार नहीं थीं। वह पूरी राशि 6% वार्षिक ब्याज सहित 60 दिनों के भीतर राज्य कोष/सक्षम प्राधिकारी के पास जमा कराई जाए।

क्यों है यह फैसला अहम

यह फैसला सरकारी कर्मचारियों, सेवा विवादों, जन्मतिथि सुधार से जुड़े मामलों में नजीर (Precedent) के तौर पर अहम माना जा रहा है।

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